Thursday, 2 October 2014

दूसरों की सहायता से भी कब तक काम चल सकता है?


एक चूहा था। किसी तपस्वी की कुटी में रहता था। बिल्ली उधर से निकलती तो चूहा डर से काँपने लगता। महात्मा ने उससे भयातुरता का कारण और निवारण पूछा। चूहे ने कहा- बिल्ली का भय सताता है। मुझे बिल्ली बना दीजिए ताकि निर्भय रह सकूँ।
तपस्वी ने वैसा ही किया। चूहा बिल्ली बन गया और सिर उठा कर उस क्षेत्र में विचरण करने लगा।
कुत्तों ने उसे देख पाया तो खदेड़ने लगे। बिल्ली पर फिर संकट छाया और फिर से तपस्वी से अनुरोध किया- इस बार भी संकट से छुड़ाएं और कुत्ता बना दें। दयालु महात्मा ने उसकी मनोकामना पूरी कर दी। बिल्ली अब कुत्ता बनकर भौंकने लगी। अधिक दिन बीतने न पाए थे कि जंगली भेड़िये को उसकी गंध मिल गई और उसे मार खाने के लिए चक्कर लगाने लगा। कुत्ते का त्रास फिर लौट आया। डरे, घबड़ाएं कुत्ते ने महात्मा का फिर आँचल पकड़ा। जाकर नया वरदान माँगा, भेड़िया बन जाने का। इस बार की भी मनोकामना पूर्ण हो गई।
भेड़िये को सिंह नहीं देख सकते। वे उससे घोर शत्रुता मानते हैं। सिंह परिवार को सूचना मिली तो वे उस भेड़िये की जान लेने पर उतारू हो गए। भेडिया क्या करता। महात्मा ही उसे त्राण दिला सकते थे। सिंह बन कर निश्चिन्त रहने की कामना जगी और गिड़गिड़ाकर किसी प्रकार अबकी वार भी उसकी पूर्ति करा ली। अब उसका परिवर्तित रूप सिंह का था पहाड़ में उसने सारा क्षेत्र गुँजाना आरंभ कर दिया। बहुत दिन नहीं बीते थे कि शिकारियों का एक छकड़ा, सिंहों के शवों से भरा हुआ निकाला। शिकारियों ने उस क्षेत्र के सभी सिंह मार दिए थे। एक बचा था। उसी की तलाश करते वे महात्मा की कुटी वाले सिंह की ढूंढ़ खोज चला रहे थे। वरदान से बने सिंह को पता चला तो संकट की घड़ी सिर मँडराती दीखी। जाता कहाँ ? तपस्वी के पास ही हर संकट निवारण और मनोरथ पूरा कराने पहुँचता था। इस बार भी जा पहुँचा। अबकी बार तपस्वी मुद्रा बदली हुई थी। उन्होंने कमण्डल से जल छिड़ककर सिंह को फिर चूहा बना दिया। बोले-”संकटों का सामना करने का जिसमें साहस, पराक्रम नहीं, उसके लिए दूसरों की सहायता से भी कब तक काम चल सकता है ?”
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गरीब कौन है?


एक महर्षि थे। उनका नाम था कणाद। किसान जब अपना खेत काट लेते थे तो उसके बाद जो अन्न-कण पड़े रह जाते थे, उन्हें बीन करके वे अपना जीवन चलाते थे। इसी से उनका यह नाम पड़ गया था।
उन जैसा दरिद्र कौन होगा! देश के राजा को उनके कष्ट का पता चला। उसने बहुत-सी धन-सामग्री लेकर अपने मन्त्री को उन्हें भेंट करने भेजा।
मंत्री पहुंचा तो महर्षि ने कहा,"मैं सकुशल हूं। इस धन को तुम उन लोगों में बांट दो, जिन्हें इसकी जरुरत है।"
इस भांति राजा ने तीन बार अपने मंत्री को भेजा और तीनों बार महर्षि ने कुछभी लेने से इन्कार कर दिया। अंत में राजा स्वयं उनके पास गया। वह अपने साथ बहुत-सा धन ले गया। उसने महर्षि से प्रार्थना की कि वे उसे स्वीकार कर लें, किन्तु वे बोले, "उन्हें दे दो, जिनके पास कुछ नहीं है। मेरे पास तो सबकुछ है।"
राजा को विस्मय हुआ! जिसके तन पर एक लंगोटी मात्र है, वह कह रहा है कि उसके पास सबकुछ है।
उसने लौटकर सारी कथा अपनी रानी से कही। वह बोली, "आपने भूल की। ऐसे साधु के पास कुछ देने के लिए नहीं, लेने के लिए जाना चाहिए।"
राजा उसी रात महर्षि के पास गया और क्षमा मांगी।
महर्षि कणाद ने कहा, "गरीब कौन है? मुझे देखो और अपने को देखो। बाहर नहीं, भीतर। मैं कुछ भी नहीं मांगता, कुछ भी नहीं चाहता। इसलिए अनायास ही सम्राट हो गया हूं।" एक सम्पदा बाहर है, एक भीतर है। जो बाहर है, वह आज या कल छिन ही जाती है। इसलिए जो जानते हैं, वे उसे सम्पदा नहीं, विपदा मानते हैं। जो भीतर है, वह मिलती है तो खोती नहीं। उसे पाने पर फिर कुछ भी पाने को नहीं रह जाता।
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